भरत शर्मा व्यास: भोजपुरी संगीत के अनमोल रत्न की जीवन गाथा
भोजपुरी संगीत की दुनिया में एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी मधुर आवाज़ और गहरी गायकी से लाखों दिलों को छू लिया। यह नाम है भरत शर्मा व्यास, जिन्हें "भोजपुरी सम्राट" के नाम से जाना जाता है। उनकी गायकी ने न केवल भोजपुरी भाषा को गौरवान्वित किया, बल्कि निर्गुण और भक्ति संगीत के क्षेत्र में भी एक नया आयाम स्थापित किया। इस लेख में हम उनके जीवन की पूरी कहानी को आपके सामने लाएंगे—उनके जन्म से लेकर आज तक की यात्रा को, हर पहलू को छूते हुए, सादगी और मानवीय भाव के साथ। तो चलिए, शुरू करते हैं इस महान कलाकार की जीवनी को।
प्रारंभिक जीवन
भरत शर्मा व्यास का जन्म 1 अगस्त 1957 को बिहार के बक्सर जिले के सिमहरी प्रखंड में स्थित नगपुरा गाँव में हुआ था। उनका जन्म एक साधारण परिवार में हुआ, लेकिन संगीत उनके खून में बस्ता था। उनके पिता, स्वर्गीय राजेश्वर शर्मा, एक शास्त्रीय संगीत के गायक और वादक थे। घर में हमेशा संगीत का माहौल रहता था, और छोटे भरत को अपने पिता को गाते और वाद्य बजाते देख बड़ा आनंद मिलता था। उनके पिता ही उनके पहले गुरु बने और उन्हें संगीत की बुनियादी तालीम दी।
भरत की पढ़ाई गाँव के स्कूल में हुई। हालाँकि, किताबों से ज्यादा उनकी रुचि संगीत में थी। वे स्कूल से लौटकर अपने पिता के साथ बैठते और राग-रागिनियों की दुनिया में खो जाते। बाद में, उनकी मुलाकात जगदीश सिंह से हुई, जो बलिया (उत्तर प्रदेश) के रहने वाले एक मशहूर संगीतज्ञ थे। जगदीश सिंह ने भरत को गायन की बारीकियाँ सिखाईं और उनकी आवाज़ को तराशा। गुरु की यह शिक्षा उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
बचपन में भरत शांत और संवेदनशील स्वभाव के थे। गाँव की गलियों में खेलते हुए, नदियों के किनारे बैठकर, वे अक्सर लोक गीत गुनगुनाते थे। उनकी माँ उन्हें प्यार से "गवैया" कहकर बुलाती थीं, और शायद उन्हें भी नहीं पता था कि उनका यह लाडला एक दिन भोजपुरी संगीत का सिरमौर बन जाएगा।
करियर की शुरुआत
भरत शर्मा व्यास का संगीत सफर औपचारिक रूप से 1971 में शुरू हुआ। उस समय उनकी उम्र थी महज 14 साल। बक्सर में भोजपुरी के महान साहित्यकार और नाटककार भिखारी ठाकुर की याद में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था। भिखारी ठाकुर का देहांत हो चुका था, और उनके सम्मान में यह आयोजन रखा गया था। भरत को इस मंच पर गाने का मौका मिला। जब उन्होंने अपनी कच्ची-पक्की आवाज़ में गाना शुरू किया, तो वहाँ मौजूद हर शख्स दंग रह गया। उनकी आवाज़ में एक जादू था, जो सीधे दिल तक उतरता था।
इस प्रदर्शन के बाद भरत को कई लोगों ने सराहा। स्थानीय कलाकारों और संगीत प्रेमियों ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे संगीत को गंभीरता से लें। उस दौर में भोजपुरी संगीत का बड़ा केंद्र कलकत्ता (अब कोलकाता) था। वहाँ कई स्टूडियो थे, जहाँ भोजपुरी गाने रिकॉर्ड होते थे। भरत ने भी अपना रुख कलकत्ता की ओर किया। शुरुआती दिन आसान नहीं थे। गाँव से शहर की चकाचौंध में पहुँचना, छोटे-छोटे मंचों पर गाना, और अपनी पहचान बनाना—यह सब एक संघर्ष था। लेकिन उनकी मेहनत रंग लाई।
1992 में उनका पहला बड़ा ब्रेक आया, जब टी-सीरीज ने उनका निर्गुण एल्बम "गवनवा के साड़ी" रिलीज किया। इस एल्बम ने धूम मचा दी। गाँव-गाँव, शहर-शहर, हर जगह लोग इसे गुनगुनाने लगे। यह एल्बम इतना हिट हुआ कि इसने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसके बाद भरत शर्मा व्यास का नाम भोजपुरी संगीत की दुनिया में गूंजने लगा।
प्रसिद्धि की ऊंचाइयाँ
भरत शर्मा व्यास ने अपने करियर में 4,500 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए हैं, जो अपने आप में एक कीर्तिमान है। उन्हें "भोजपुरी सम्राट" की उपाधि दी गई, और वे निर्गुण संगीत के सबसे बड़े गायक माने जाते हैं। निर्गुण भक्ति संगीत, जो ईश्वर की भक्ति को बिना रूप और आकार के व्यक्त करता है, को उन्होंने अपनी गायकी से जीवंत कर दिया। उनके गानों में रामायण, महाभारत, और कबीर के दोहे जैसे विषयों की गहराई होती है, जो सुनने वालों को आध्यात्मिक सुकून देती है।
लोकप्रिय गाने
उनके कुछ सबसे मशहूर गानों की सूची इस तरह है:
"एक तऽ मो बारी भोरी" - एक भावुक गीत जो प्यार और विरह को बयां करता है।
"फुर देना उड़ पोसल चिरईया" - निर्गुण शैली का एक शानदार नमूना।
"धोवत धोवत तोहरी मंदिरवा" - भक्ति से भरा एक गीत।
"निमिया के दाद मईया" - नवरात्रि का यह गाना आज भी हर घर में गूंजता है।
भरत शर्मा व्यास के सभी गाने एक जगह : यहाँ से जाएँ
इन गानों ने भोजपुरी संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया। उनके प्रशंसक न सिर्फ बिहार और उत्तर प्रदेश में हैं, बल्कि झारखंड, मैथिली क्षेत्र, और विदेशों में बसे भोजपुरी भाषी लोग भी उनकी गायकी के दीवाने हैं।
पुरस्कार और सम्मान
भरत शर्मा व्यास को उनके योगदान के लिए 23 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। हाल ही में उन्हें राष्ट्रीय नाट्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया, जो उनके लिए एक बड़ा गर्व का पल था। ये सम्मान उनकी कला और मेहनत का सबूत हैं।
उनके मंच प्रदर्शन भी कमाल के होते हैं। जब वे गाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो। उनकी आवाज़ में एक दर्द, एक भक्ति, और एक जुनून होता है, जो सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
फिल्मों में योगदान
भरत शर्मा व्यास ने दस से अधिक भोजपुरी फिल्मों में गीत गाए, जिससे उन्हें प्लेबैक सिंगिंग में भी स्थान मिला। उनके गीतों ने फिल्मों को लोक-रस से परिपूर्ण किया।
व्यक्तिगत जीवन
भरत शर्मा व्यास का निजी जीवन उनकी गायकी की तरह ही सादा और सच्चा है। वे अपने परिवार के साथ झारखंड के धनबाद जिले में रहते हैं, जहाँ उनका पैतृक गाँव है। वे अपने परिवार को बहुत महत्व देते हैं और जब भी मौका मिलता है, अपने बच्चों और पत्नी के साथ वक्त बिताते हैं। उनकी शादीशुदा जिंदगी निजी रही है, और वे इसे सुर्खियों से दूर रखते हैं।
राजनीतिक सफर
संगीत के अलावा, भरत शर्मा राजनीति में भी सक्रिय रहे हैं। मई 2018 में उन्हें दिल्ली भाजपा के संस्कृति प्रकोष्ठ का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। वे भोजपुरी भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए राजनीति में आए। वे चाहते हैं कि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए, ताकि इस भाषा को और सम्मान मिले। इसके लिए वे लगातार प्रयास कर रहे हैं।
26 नवंबर 2021 को All India Cine Workers Association ने उन्हें बिहार एवं झारखंड का सह-इंचार्ज नियुक्त किया , चुनाव आयोग ने उन्हें बक्सर जिले का ब्रांड एम्बेसडर भी बनाया
शौक और रुचियाँ
उनके शौक में भोजपुरी लोक संस्कृति को संरक्षित करना और पारंपरिक संगीत को बढ़ावा देना शामिल है। वे अक्सर युवा कलाकारों से मिलते हैं और उन्हें सलाह देते हैं कि संगीत में आत्मा होनी चाहिए, सिर्फ पैसा कमाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए। उन्हें गाँव की मिट्टी से गहरा लगाव है, और वे अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।
विवाद
हर बड़े इंसान की जिंदगी में कुछ विवाद आते हैं, और भरत शर्मा व्यास भी इससे अछूते नहीं रहे। 28 जनवरी 2005 को आयकर विभाग ने उनके खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के आधार पर रिटर्न क्लेम करने का मामला दर्ज किया। जूनाब जे एम के ट्रिपाठी की अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए दो वर्ष की कैद और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। बाद में झारखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर उन्होंने आत्मसमर्पण किया।
मई 2017 में यह मामला पुनः सुर्खियों में आया और उन्हें धनबाद मंडल जेल में बंद होना पड़ा, जहाँ हाल ही में उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें CCU में भर्ती कराया गया था
इसके अलावा, उन्होंने भोजपुरी संगीत में बढ़ती अश्लीलता पर भी खुलकर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि आज के कई गायक "नचनिया" बन गए हैं और भोजपुरी की शुद्धता को भूल गए हैं। वे हमेशा कहते हैं, "भोजपुरी संगीत हमारी संस्कृति का हिस्सा है, इसे गंदा मत करो।"
विरासत
भरत शर्मा व्यास ने भोजपुरी संगीत को नई पहचान दी है। उन्होंने निर्गुण संगीत को फिर से जीवंत किया और इसे आम लोगों तक पहुँचाया। उनकी गायकी ने न सिर्फ पुराने गायकों को सम्मान दिया, बल्कि नए कलाकारों को भी प्रेरित किया। आज कई युवा गायक उनकी शैली को अपनाने की कोशिश करते हैं।
उनके गानों में भोजपुरी की मिट्टी की सोंधी खुशबू है। वे कहते हैं, "मैं मिलियन व्यूज के लिए नहीं गाता, ना ही सिर्फ पैसों के लिए। मैं अपने प्यारे श्रोताओं के लिए गाता हूँ।" यह बात उनके समर्पण को दिखाती है।
भरत शर्मा व्यास की विरासत भोजपुरी संगीत में हमेशा जिंदा रहेगी। उन्होंने भोजपुरी को गर्व करने का मौका दिया और भारतीय संगीत के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा।
वर्तमान स्थिति और भावी योजनाएँ
आज भी भरत शर्मा व्यास स्टेज शो, रिकॉर्डिंग और सोशल प्लेटफ़ॉर्म्स पर सक्रिय हैं। वे नई पीढ़ी को भोजपुरी लोकगीत एवं निर्गुण संगीत की विरासत से परिचित कराने में जुटे हैं और आने वाले दिनों में एक नई म्यूजिक फ़्यूज़न एल्बम पर काम कर रहे हैं।
निष्कर्ष:
भरत शर्मा व्यास ने संघर्षों के बीच अपनी अनूठी आवाज़ से भोजपुरी संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई। उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि सच्ची लगन और मेहनत किसी भी बाधा को पार कर देती है।
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