Republic Day:26th January celebrated? History, Constitution, Parade and interesting facts

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भारत का गणतंत्र: संवैधानिक विकास, ऐतिहासिक विरासत और समकालीन गौरव 

भारतीय राष्ट्र के जीवन में 26 जनवरी का दिन केवल एक कैलेंडर तिथि नहीं है, बल्कि यह उस महान संकल्प की सिद्धि का प्रतीक है जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने दशकों पहले देखा था। यह दिन भारत के एक ब्रिटिश उपनिवेश से पूर्ण संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनने की ऐतिहासिक यात्रा का उत्सव है । इस व्यापक शोध रिपोर्ट में, हम 26 जनवरी के चयन के ऐतिहासिक कारणों, संविधान निर्माण की जटिल प्रक्रिया, इस पथ में आने वाली दुर्गम चुनौतियों, संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से इसके विकास और गणतंत्र दिवस से जुड़े उन अनछुए पहलुओं का विश्लेषण करेंगे जो इसे विश्व के सबसे जीवंत लोकतंत्र का आधार बनाते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 26 जनवरी और पूर्ण स्वराज का संकल्प

गणतंत्र दिवस के लिए 26 जनवरी की तिथि का चयन कोई आकस्मिक घटना नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक गहरा ऐतिहासिक और भावनात्मक तर्क छिपा था। इस तिथि का महत्व 1947 की स्वतंत्रता से भी लगभग दो दशक पहले से जुड़ा हुआ है, जब भारत का स्वतंत्रता संग्राम एक निर्णायक मोड़ पर था । 

लाहौर अधिवेशन और 1930 की घोषणा

दिसंबर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का ऐतिहासिक अधिवेशन लाहौर में रावी नदी के तट पर पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में संपन्न हुआ था। इस अधिवेशन की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत को 'डोमिनियन स्टेटस' (ब्रिटिश शासन के अधीन स्वायत्तता) देने में की जा रही टालमटोल की नीति थी। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने 1929 में एक अस्पष्ट घोषणा की थी कि भारत को भविष्य में डोमिनियन स्टेटस दिया जा सकता है, लेकिन ब्रिटिश संसद और जनता के विरोध के कारण वे किसी निश्चित समयसीमा का वादा नहीं कर सके ।  

इस गतिरोध से क्षुब्ध होकर, कांग्रेस ने डोमिनियन स्टेटस की मांग को पूरी तरह त्याग दिया और 'पूर्ण स्वराज' (पूर्ण स्वतंत्रता) का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया। 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को नेहरू ने रावी तट पर तिरंगा फहराया और भारतीयों से ब्रिटिश शासन को पूर्णतः उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। इसी अधिवेशन में यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाएगा ।

पूर्ण स्वराज घोषणापत्र के निहितार्थ

26 जनवरी 1930 को जो घोषणापत्र जारी किया गया, वह लगभग 750 शब्दों का एक ऐसा दस्तावेज़ था जिसने ब्रिटिश शासन के आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अन्याय को उजागर किया। इसमें स्पष्ट किया गया कि भारतीयों की औसत आय केवल सात पैसे प्रतिदिन है और उन पर भारी कर (जैसे नमक कर और भूमि राजस्व) लादे गए हैं। घोषणापत्र में ब्रिटिश शासन द्वारा ग्रामीण उद्योगों के विनाश और अनिवार्य निरस्त्रीकरण के माध्यम से भारतीयों को 'अपुरुषोचित' (unmanly) बनाने की कड़ी आलोचना की गई थी.

इस दिन देश भर के हजारों लोगों ने स्वतंत्रता की शपथ ली। इसके बाद अगले 17 वर्षों तक, यानी 15 अगस्त 1947 को वास्तविक स्वतंत्रता मिलने तक, 26 जनवरी को ही भारत के 'स्वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाया जाता रहा। जब 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, तो वह तिथि ब्रिटिश राजनीतिक सुविधा (लॉर्ड माउंटबेटन की पसंद) के अनुसार चुनी गई थी। हालांकि, भारतीय नेतृत्व 26 जनवरी की उस पवित्र तिथि के महत्व को अक्षुण्ण रखना चाहता था। यही कारण था कि जब 26 नवंबर 1949 को संविधान तैयार हो गया, तब भी इसे लागू करने के लिए जानबूझकर 26 जनवरी 1950 का इंतजार किया गया, ताकि भारत के गणतंत्र बनने की घोषणा उसी ऐतिहासिक दिन पर की जा सके ।

संविधान निर्माण की महागाथा: प्रक्रिया, समितियाँ और प्रमुख व्यक्तित्व

भारत का संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है, जो न केवल शासन के नियमों का समूह है बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामाजिक और आर्थिक आकांक्षाओं का एक जीवंत दस्तावेज़ है । इसके निर्माण की यात्रा 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक के साथ शुरू हुई थी ।

संविधान सभा की संरचना

संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के तहत किया गया था। इसकी संरचना भारत की विविधता को प्रतिबिंबित करती थी।

सभा का विवरण                                                                सांख्यिकीय डेटा
कुल सदस्य (दिसंबर 1946 - जून 1947)                               389 सदस्य
विभाजन के बाद सदस्य (अगस्त 1947 के बाद)                      299 सदस्य
ब्रिटिश भारतीय प्रांतों के प्रतिनिधि                                        292 सदस्य
रियासतों (Princely States) के प्रतिनिधि                             93 सदस्य
मुख्य आयुक्त प्रांत (दिल्ली, अजमेर, कुर्ग, ब्रिटिश बलूचिस्तान)    4 सदस्य
संविधान निर्माण में लगा कुल समय                                        2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन
संविधान सभा के कुल सत्र                                                  11 सत्र
बैठकों की कुल संख्या                                                       165 दिन

प्रारूप समिति (Drafting Committee) और डॉ. अंबेडकर की भूमिका

संविधान के अंतिम रूप को आकार देने का सबसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व 'प्रारूप समिति' को सौंपा गया था, जिसका गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ। डॉ. भीमराव अंबेडकर इसके अध्यक्ष थे। उनके नेतृत्व में समिति ने विभिन्न देशों के संविधानों का गहन अध्ययन किया और भारतीय समाज की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप प्रावधानों को शामिल किया ।

प्रारूप समिति के अन्य प्रमुख सदस्यों ने भी विशेषज्ञ योगदान दिया:

अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर: एक प्रख्यात बैरिस्टर जिन्होंने न्यायिक और कानूनी प्रावधानों को सुदृढ़ किया ।  
एन. गोपालस्वामी अय्यंगर: संघीय ढांचे और राज्यों के पुनर्गठन के विशेषज्ञ ।  
के.एम. मुंशी: मौलिक अधिकारों और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रबल समर्थक ।   
मोहम्मद सादुल्ला: अल्पसंख्यक अधिकारों और क्षेत्रीय हितों (विशेषकर असम) के रक्षक ।   
बी.एल. मित्तर / एन. माधव राव: कानूनी और प्रशासनिक बारीकियों पर कार्य किया ।   
डी.पी. खेतान / टी.टी. कृष्णमाचारी: वित्त और आर्थिक पहलुओं पर योगदान । 

संवैधानिक सलाहकार के रूप में बी.एन. राव का योगदान अतुलनीय था। उन्होंने संविधान का प्रारंभिक मसौदा तैयार किया और अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों के साथ इसका सामंजस्य बिठाया ।

संविधान की स्वीकृति और कार्यान्वयन

संविधान का अंतिम प्रारूप 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा अंगीकार किया गया था, जिसे वर्तमान में 'संविधान दिवस' के रूप में मनाया जाता है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के 284 सदस्यों ने हिंदी और अंग्रेजी में हस्तलिखित प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। अंततः 26 जनवरी 1950 को संविधान को संपूर्ण भारत में लागू किया गया, और इसी दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली ।

कार्यान्वयन के पथ पर चुनौतियाँ: एक नवजात राष्ट्र का संघर्ष

स्वतंत्रता के समय भारत एक विखंडित और आर्थिक रूप से जर्जर राष्ट्र था। संविधान को लागू करना और उसे वास्तविकता में बदलना एक अत्यंत कठिन कार्य था। नेताओं और संविधान निर्माताओं को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा ।

विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा

विभाजन के कारण उत्पन्न हुई हिंसा ने 12 से 20 मिलियन लोगों को विस्थापित किया और लाखों लोगों की जान ली। ऐसे माहौल में एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक पहचान स्थापित करना चुनौतीपूर्ण था। शरणार्थियों के पुनर्वास और दंगों के बीच कानून व्यवस्था बनाए रखना प्राथमिकता थी ।

रियासतों का एकीकरण और पटेल की कूटनीति

आजादी के समय भारत में 565 रियासतें थीं, जिन्हें स्वतंत्र रहने या किसी भी अधिराज्य (भारत या पाकिस्तान) में शामिल होने का विकल्प दिया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन ने 'कैरट एंड स्टिक' (Carrot and Stick) नीति का उपयोग करते हुए इन राज्यों का विलय सुनिश्चित किया। हैदराबाद में 'ऑपरेशन पोलो' और जूनागढ़ में जनमत संग्रह (Plebiscite) के माध्यम से एकीकरण संभव हुआ। कश्मीर का मुद्दा आज भी ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ राजा हरि सिंह ने घुसपैठ के बाद भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए ।

सामाजिक और आर्थिक विषमता

उस समय भारत की साक्षरता दर बहुत कम थी और गरीबी चरम पर थी। लोगों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना और एक ऐसी व्यवस्था बनाना जहाँ अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचे, एक दीर्घकालिक चुनौती थी। मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के बीच संतुलन बिठाना एक प्रमुख बहस का विषय रहा.

भाषाई और क्षेत्रीय पहचान

भारत विविध भाषाओं और संस्कृतियों का संगम है। राजभाषा के मुद्दे पर उत्तर और दक्षिण भारत के बीच गहरा मतभेद था। हिंदी और अंग्रेजी के बीच समझौते (मंशी-अय्यंगर फॉर्मूला) के माध्यम से इस तनाव को कम करने का प्रयास किया गया। बाद में 1956 के सातवें संशोधन के माध्यम से भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन एक बड़ी प्रशासनिक आवश्यकता बन गया ।

संविधान की कलात्मक और हस्तलेखन विरासत

भारतीय संविधान केवल एक कानूनी ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह कला का एक श्रेष्ठ उदाहरण भी है। यह दुनिया का सबसे बड़ा हस्तलिखित संविधान है ।

सुलेख (Calligraphy) और प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा

प्रधानमंत्री नेहरू के अनुरोध पर, प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने पूरे संविधान को सुंदर इटैलिक शैली में लिखा। उन्होंने इसके लिए कोई पारिश्रमिक नहीं लिया, बस एक ही शर्त रखी कि वे हर पन्ने पर अपना नाम और अंतिम पन्ने पर अपने दादा का नाम लिखेंगे। उन्होंने 432 पेन निब का उपयोग करके 251 पन्नों को छह महीने में पूर्ण किया ।

चित्रण और नंदलाल बोस की टीम

संविधान के प्रत्येक भाग के प्रारंभ में भारत के सांस्कृतिक इतिहास को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है। नंदलाल बोस (शांतिनिकेतन) के नेतृत्व में कलाकारों की एक टीम ने इन चित्रों को उकेरा।

ऐतिहासिक कालखंड / विषय     चित्रित दृश्य
मोहनजोदड़ो काल            हड़प्पा कालीन मोहरें और कलाकृतियाँ।
वैदिक काल                    गुरुकुल और वैदिक ऋषियों के आश्रम।
महाकाव्य काल           रामायण (लंका विजय) और महाभारत (कृष्ण द्वारा अर्जुन को गीता उपदेश)।
बौद्ध और जैन काल बुद्ध और महावीर के जीवन से संबंधित प्रसंग।
ऐतिहासिक साम्राज्य           सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रसार, मौर्य और गुप्त कला।
मध्यकालीन भारत       विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा विश्वविद्यालय, नटराज की प्रतिमा।
मुस्लिम काल               सम्राट अकबर और मुगल वास्तुकला।
स्वतंत्रता संग्राम           रानी लक्ष्मीबाई, टीपू सुल्तान, गांधीजी की दांडी यात्रा, सुभाष चंद्र बोस।
प्राकृतिक भूगोल           हिमालय, रेगिस्तान और महासागर के चित्र।
मूल हस्तलिखित प्रतियां संसद भवन के पुस्तकालय में हीलियम गैस से भरे विशेष बक्सों में सुरक्षित रखी गई हैं ताकि वे समय के साथ खराब न हों ।

संविधान लागू  गणतंत्र की शुरुआत


26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर देश आधिकारिक रूप से गणतंत्र बना। ब्रिटिश शासन के अधिनियम (Government of India Act 1935) को रद्द करके नए संविधान को सर्वोच्च कानून बनाया गया। इस दिन से भारत का नाम “संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित हुआ। बाद में 1976 में पारित चौवालीसवें संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए, जिससे भारत “संघीय, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” बना।

गणतंत्र दिवस को अक्सर स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के साथ मिलाया जाता है, लेकिन इन दोनों का अर्थ भिन्न है। 15 अगस्त विदेशी शासन से मुक्ति का प्रतीक है, जबकि 26 जनवरी संविधान के तहत पूर्ण स्वशासन की स्थापना का दिन है।

संवैधानिक संशोधन: बदलती परिस्थितियों के साथ विकास

भारतीय संविधान एक 'जीवंत दस्तावेज़' (Living Document) है। अनुच्छेद 368 के अंतर्गत इसमें संशोधन की शक्ति संसद को प्रदान की गई है ताकि यह समय की आवश्यकताओं के अनुसार विकसित हो सके ।

संशोधनों का सांख्यिकीय अवलोकन

अक्टूबर 2026 तक भारतीय संविधान में कुल 106 संशोधन किए जा चुके हैं।

महत्वपूर्ण संशोधन,  वर्ष,  मुख्य प्रावधान और प्रभाव
प्रथम संशोधन,  1951,  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'उचित प्रतिबंध' जोड़े गए; नौवीं अनुसूची के माध्यम से भूमि सुधार कानूनों को सुरक्षा दी गई। 
7वाँ संशोधन,  1956,  राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया गया; केंद्र शासित प्रदेशों का वर्गीकरण समाप्त किया गया। 
42वाँ संशोधन,  1976, इसे 'लघु संविधान' कहा जाता है। प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए; मौलिक कर्तव्यों का समावेश हुआ।
44वाँ संशोधन,  1978,  आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के उपाय; 'संपत्ति के अधिकार' को मौलिक अधिकार से हटाकर विधिक अधिकार बनाया गया। 
73वाँ / 74वाँ,  1992,  स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज और नगर निकाय) को संवैधानिक मान्यता। 
86वाँ संशोधन,  2002,  6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया (अनुच्छेद 21A)। 
101वाँ संशोधन,  2016,  वस्तु एवं सेवा कर (GST) का कार्यान्वयन। 
103वाँ संशोधन,  2019, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था।
106वाँ संशोधन,  2023,  नारी शक्ति वंदन अधिनियम - लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण। 

गणतंत्र दिवस से जुड़ी कुछ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ

झंडा फहराना (Unfurling): 26 जनवरी को राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं, जो पहले से ही पोल के शीर्ष पर बंधा होता है (Unfurling), जबकि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री झंडा नीचे से ऊपर खींचकर फहराते हैं (Hoisting)। यह अंतर इस बात का प्रतीक है कि 15 अगस्त को भारत एक नया स्वतंत्र देश बना था, जबकि 26 जनवरी को स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान लागू किया ।

तोपों की सलामी: 21 तोपों की सलामी के लिए स्वदेशी '105-एमएम इंडियन फील्ड गन' का उपयोग किया जाता है। यह सलामी राष्ट्रगान की अवधि (52 सेकंड) के साथ तालमेल बिठाकर दी जाती है । 
  
पद्म पुरस्कार: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति नागरिक सम्मानों (पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री) की घोषणा करते हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले नागरिकों को दिए जाते हैं ।   

2026 की थीम: आगामी गणतंत्र दिवस की थीम 'वंदे मातरम के 150 वर्ष' है, जो राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक भूमिका और इसके रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के प्रति एक श्रद्धांजलि है । 

गणतंत्र दिवस समारोह की परंपराएँ और रोचक तथ्य

दिल्ली में होने वाली गणतंत्र दिवस की परेड भारत की सामरिक शक्ति और सांस्कृतिक धरोहर का एक अद्भुत संगम है ।

परेड का विकास और आधुनिकता

पहली परेड 1950 में मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम (इरविन स्टेडियम) में आयोजित की गई थी। राजपथ (अब कर्तव्य पथ) 1955 में इसका स्थायी आयोजन स्थल बना। परेड का नेतृत्व भारतीय सेना के तीनों अंगों के वरिष्ठ अधिकारी करते हैं और राष्ट्रपति को सलामी दी जाती है ।

2026 के समारोह में कई आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन देखा जा सकता है, जैसे:
AI और निगरानी: सुरक्षा के लिए AI-सक्षम स्मार्ट चश्मा और 1,000 से अधिक चेहरे की पहचान करने वाले कैमरे।
स्वदेशी तकनीक: टी-90 'भीष्म' टैंक, ब्रह्मोस मिसाइल और 'स्वार्म ड्रोन' तकनीक का प्रदर्शन।
रोबोटिक कुत्ते: पहली बार निगरानी के लिए प्रशिक्षित रोबोटिक कुत्तों को सैन्य टुकड़ी का हिस्सा बनाया जाना।
महिला सशक्तिकरण: भारतीय तटरक्षक बल की टुकड़ी का पूर्णतः महिलाओं द्वारा नेतृत्व ।

मुख्य अतिथि की चयन प्रक्रिया और कूटनीति

गणतंत्र दिवस पर विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करने की परंपरा कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने का एक साधन है। विदेश मंत्रालय (MEA) लगभग छह से आठ महीने पहले संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार करता है। इसमें देश के रणनीतिक और आर्थिक हितों का ध्यान रखा जाता है। 2026 के लिए यूरोपीय संघ के नेतृत्व (उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा) का निमंत्रण भारत और यूरोपीय संघ के बीच 'मुक्त व्यापार समझौते' (FTA) की दिशा में बढ़ते कदमों का संकेत है ।

'बीटिंग रिट्रीट' (Beating Retreat)

29 जनवरी की शाम को विजय चौक पर 'बीटिंग रिट्रीट' समारोह के साथ उत्सव संपन्न होता है। यह समारोह ब्रिटिश सैन्य परंपरा से प्रेरित है, लेकिन अब इसमें 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसी भारतीय धुनें प्रमुखता से बजती हैं। 1955 में पहली बार ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ II की यात्रा के दौरान इसे व्यवस्थित रूप दिया गया था ।

भारतीय गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथियों की सूची:


वर्ष         पद और मुख्य अतिथि का नाम        सम्बंधित देश
2024   राष्ट्रपति - इमैनुएल मैक्रों                  फ्रांस
2023 राष्ट्रपति - अब्देल फत्ताह अल सीसी          मिस्र
2022 कोई मुख्य अतिथि नहीं
2021 कोई मुख्य अतिथि नहीं
2020 राष्ट्रपति, जेयर बोल्सोनारो                ब्राजील
2019 राष्ट्रपति, सिरिल रामाफोसा                दक्षिण अफ्रीका
2018 सभी दस आसियान देशों के प्रमुख     ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम
2017 क्राउन प्रिंस, मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान         अबु धाबी
2016 राष्ट्रपति, फ्रांस्वा ओलांद, राष्ट्रपति, मैत्रीपाल सिरिसेन    फ्राँस , श्रीलंका
2015 राष्ट्रपति, बराक ओबामा                                  यूएसए
2014 प्रधानमंत्री, शिंजो अबे                                          जापान
2013 राजा, जिग्मे खेसर नामग्याल वांग्चुक                  भूटान
2012 प्रधानमंत्री, यिंगलक चिनावाट                                 थाईलैंड
2011 राष्ट्रपति, सुसीलो बाम्बांग युद्धोयोनो                         इंडोनेशिया
2010 राष्ट्रपति, ली म्यूंग बक                                        कोरिया गणराज्य
2009 राष्ट्रपति, नूर्सुल्तान नाज़र्बायव                                कज़ाकिस्तान
2008 राष्ट्रपति, निकोलस सरकोजी                                 फ्रांस
2007 राष्ट्रपति, व्लादिमीर पुतिन                                 रुस
2006 राजा, शाह अब्दुल्ला                                       सउदी अरब, सऊदी अरब के राजा
2005 राजा, जिग्मे सिंगये वांगचुक                                भूटान
2004 राष्ट्पति, लुइज़ इंसियो लूला दा सिल्वा                ब्राजील
2003 राष्ट्पति, मोहम्मद ख़ातमी                                 इरान
2002 राष्ट्पति, कसम उतेम                                       मॉरीशस
2001 राष्ट्पति, अब्देलाज़िज बुटेफ्लिका                       अलजीरीया
2000 राष्ट्पति, ऑल्यूसगुन ओबसांजो                       नाइजीरिया
Written by - Sagar

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2026-01-26 11:41:19

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