भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विरासत का महासंगम: बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा
भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक चेतना में बसंत पंचमी का स्थान केवल एक मौसमी बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, सृजन, प्रेम और प्रकृति के पुनरुद्धार का एक सूक्ष्म संश्लेषण है । माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व 'ऋतुराज' बसंत के आगमन की विधिवत घोषणा करता है और देवी सरस्वती के उत्सव के रूप में समस्त भारत को एक सूत्र में पिरोता है । यह पर्व उस प्राचीन वैदिक परंपरा का उत्तराधिकारी है जिसमें प्रकृति और परमात्मा को अलग अलग नहीं, बल्कि एक ही ऊर्जा के दो रूपों में देखा गया है। प्रस्तुत विश्लेषण बसंत पंचमी के ऐतिहासिक मूल, शास्त्रीय आधार, पौराणिक आख्यानों और आधुनिक सामाजिक विकास का एक विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।
ऐतिहासिक मूल और व्युत्पत्ति: वैदिक काल से वर्तमान तक का सफर
बसंत पंचमी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों 'बसंत' (ऋतु) और 'पंचमी' (चंद्र पखवाड़े का पांचवां दिन) से हुई है । ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, इस उत्सव का मूल अत्यंत प्राचीन है और इसके प्रमाण ऋग्वेद के प्रारंभिक सूक्तों में मिलते हैं।
ऋग्वैदिक काल में सरस्वती का स्वरूप
प्रारंभिक वैदिक काल में, सरस्वती को मुख्य रूप से एक भौतिक और दिव्य नदी के रूप में पूजा जाता था । ऋग्वेद के मंडल 6, सूक्त 61 और मंडल 7 में उन्हें एक शक्तिशाली और अदम्य नदी के रूप में वर्णित किया गया है जो पहाड़ों को चीरती हुई बहती है । इस काल में वे शुद्धिकरण, प्रचुरता और विनाशक शक्तियों (वृत्रहंता के समान) का प्रतीक थीं ।
समय के साथ, भौतिक नदी का स्वरूप आध्यात्मिक और बौद्धिक सत्ता में परिवर्तित होने लगा। वैदिक ऋषियों ने अनुभव किया कि जिस प्रकार जल शरीर को शुद्ध करता है, उसी प्रकार ज्ञान मन को संस्कारित करता है। ऋग्वेद (1:3:12) में उन्हें 'धी' (प्रेरित विचार या अंतर्ज्ञान) की अधिष्ठात्री कहा गया है । यहीं से उनके 'वाक्' (वाणी) के रूप में विकास की यात्रा शुरू हुई, जो अंततः उन्हें शिक्षा और कला की देवी के रूप में स्थापित कर गई ।
ऐतिहासिक काल सरस्वती का प्राथमिक स्वरूप सांस्कृतिक महत्व
प्रारंभिक वैदिक काल नदी (सिंधु की सहायक) शुद्धिकरण, जीवनदायिनी शक्ति, भौतिक प्रचुरता
उत्तर वैदिक काल वाक् (वाणी) मंत्रों की माता, वेदों का संकलन, ब्राह्मण ग्रंथों में केंद्रीय स्थान
पौराणिक काल ज्ञान की देवी (विद्यादायिनी) वीणा-पुस्तक धारिणी, हंसवाहिनी, सृजन की शक्ति
मध्यकाल और आधुनिक काल संस्थागत पूजा शैक्षणिक संस्थानों में उत्सव, कला और संगीत का प्रतीक
शास्त्रीय संदर्भ: शास्त्रों में बसंत पंचमी का उल्लेख
भारतीय धर्मग्रंथों की एक विस्तृत श्रृंखला में बसंत पंचमी और देवी सरस्वती की महिमा का गान किया गया है। ये शास्त्र न केवल इस पर्व की धार्मिक महत्ता को पुष्ट करते हैं, बल्कि इसके पीछे के दार्शनिक रहस्यों को भी उजागर करते हैं।
ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषद
शतपथ ब्राह्मण जैसे ग्रंथों में 'वाक्' को प्रजापति (ब्रह्मा) की दूसरी रचना के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो सृजन का मुख्य माध्यम बनी । इसमें कहा गया है कि जिस प्रकार सभी नदियाँ अंततः समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार सभी विद्याएँ वाणी (सरस्वती) में विलीन होती हैं । यह विचार सरस्वती को ज्ञान के सार्वभौमिक केंद्र के रूप में स्थापित करता है।
पुराणों में उल्लेख
विभिन्न पुराणों में बसंत पंचमी के दिन को सृष्टि के चैतन्य होने का दिन माना गया है:
मत्स्य पुराण और सरस्वती पुराण: इन पुराणों में ब्रह्मा द्वारा सरस्वती के सृजन की कथा विस्तार से दी गई है । इसमें ब्रह्मा के चार मुखों और सरस्वती के पलायन की दार्शनिक व्याख्या है, जो चेतना के विस्तार को दर्शाती है ।
देवी भागवत पुराण: इस ग्रंथ के अनुसार, भगवान कृष्ण ने स्वयं सरस्वती को ज्ञान की देवी के रूप में स्थापित किया और उन्हें वीणा प्रदान की । यहाँ सरस्वती को राधा के मुख से उत्पन्न और विष्णु की शक्ति के रूप में भी वर्णित किया गया है ।
स्कंद पुराण: इसमें बसंत पंचमी के दिन किए जाने वाले विशिष्ट अनुष्ठानों और ऋतु परिवर्तन के आध्यात्मिक लाभों का वर्णन मिलता है।
पौराणिक कथाएं और किंवदंतियां: विश्वास और परंपरा
ब्रह्मा की सृष्टि और मौन का अंत
सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की, तो उन्हें सब कुछ मूक और नीरस लगा । चारों ओर व्याप्त सन्नाटे को देखकर वे चिंतित हुए तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रम्हा जी के किये स्तुति को सुन कर भगवान विष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहां तुरंत ही प्रकट हो गयीं तब ब्रम्हा एवं विष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।
ब्रम्हा जी तथा विष्णु जी बातों को सुनने के बाद उसी क्षण आदिशक्ति दुर्गा माता के शरीर से स्वेत रंग का एक भारी तेज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा थे । अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुरनाद किया जिससे संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी "सरस्वती" कहा।[2]
फिर आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रम्हा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं के देखते - देखते वहीं अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।
कामदेव और रति का पुनर्जन्म: मदन पंचमी
बसंत पंचमी का एक गहरा संबंध प्रेम के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रति से भी है. पौराणिक संदर्भों के अनुसार, जब भगवान शिव सती के वियोग में घोर तपस्या में लीन थे, तब संसार में सृजन का कार्य रुक गया था. देवताओं के अनुरोध पर कामदेव ने शिव की समाधि भंग करने का प्रयास किया, जिससे क्रोधित होकर शिव ने उन्हें अपने तीसरे नेत्र से भस्म कर दिया.
रति की कठोर तपस्या और प्रार्थना के बाद, भगवान शिव ने बसंत पंचमी के दिन ही कामदेव को पुनर्जीवित करने का वरदान दिया. इसीलिए इस दिन को 'मदन पंचमी' के रूप में भी पूजा जाता है, जो जीवन में प्रेम और उल्लास के पुनरागमन का प्रतीक है
कालिदास और ज्ञान की प्राप्ति
संस्कृत साहित्य के शिरोमणि महाकवि कालिदास की विद्वता के पीछे भी बसंत पंचमी की एक प्रेरणादायी कथा है। माना जाता है कि अपनी मूर्खता के कारण अपमानित होने के बाद कालिदास ने नदी में डूबकर प्राण त्यागने का निश्चय किया. उसी क्षण देवी सरस्वती ने उन्हें दर्शन दिए और ज्ञान का वरदान दिया. देवी की कृपा से वे तत्कालीन समय के सबसे महान कवि और नाटककार बने. यह कथा दर्शाती है कि श्रद्धापूर्ण भक्ति से अज्ञानता के घोर अंधकार को भी मिटाया जा सकता है।
बसंत पंचमी का सामाजिक प्रभाव
प्राचीन काल से आधुनिक युग तक, बसंत पंचमी ने भारतीय समाज के ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। यह पर्व कृषि, शिक्षा और राष्ट्रीय चेतना का संगम बन चुका है।
शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव: विद्यारंभ संस्कार
भारतीय संस्कृति में 'अक्षर अभ्यासम' या 'विद्यारंभ' के लिए बसंत पंचमी को सर्वोत्तम दिन माना जाता है
बाल शिक्षा: इस दिन 4-5 वर्ष के बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा की दुनिया में प्रवेश कराया जाता है. ओडिशा में इसे 'खड़ी-छुआं' और बंगाल में 'हाते-खोरि' कहा जाता है.
संस्थागत उत्सव: देश भर के स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस दिन सरस्वती पूजा आयोजित की जाती है, जहाँ छात्र अपनी पुस्तकों और वाद्य यंत्रों को देवी के सम्मुख रखकर आशीर्वाद मांगते हैं.
कृषि और प्रकृति का उत्सव
बसंत पंचमी प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे जुड़ाव का उत्सव है। इस समय तक कड़ाके की ठंड कम होने लगती है और खेतों में सरसों के पीले फूल लहलहाने लगते हैं. किसानों के लिए यह नई फसल की संभावनाओं और आर्थिक समृद्धि का उत्सव है. पीला रंग, जो इस त्योहार का आधार है, सीधे तौर पर सूर्य की ऊर्जा और पकती हुई फसलों से जुड़ा है .
समावेशी भारत की झलक
बसंत पंचमी का सामाजिक प्रभाव धार्मिक सीमाओं को पार करता है:
सूफी परंपरा: दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर 700 वर्षों से बसंत मनाया जा रहा है । अमीर खुसरो द्वारा अपने पीर के शोक को दूर करने के लिए शुरू की गई यह परंपरा आज भी सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल है.
सिख परंपरा: मान्यता है कि दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी का विवाह इसी दिन हुआ था । इसके अतिरिक्त, 19वीं शताब्दी में गुरु राम सिंह कूका ने इसी दिन कूका आंदोलन की नींव रखी थी, जो स्वदेशी और नारी उत्थान के लिए समर्पित था ।
क्षेत्रीय विविधता
पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत: सामूहिक भक्ति
पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में सरस्वती पूजा का स्वरूप अत्यंत भव्य होता है. यहाँ बड़े बड़े पंडालों में देवी की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं। छात्र इस दिन पीले वस्त्र पहनकर अंजलि (पुष्प अर्पण) देते हैं. यहाँ एक विशेष नियम है कि पूजा संपन्न होने तक छात्र अपनी पढ़ाई नहीं करते, जो पुस्तकों के प्रति सम्मान का एक प्रतीकात्मक तरीका है ।
पंजाब और हरियाणा: पतंगों का उल्लास
उत्तर भारत में बसंत पंचमी का अर्थ है आसमान में उड़ती रंग बिरंगी पतंगें. महाराजा रणजीत सिंह के समय से ही लाहौर और अमृतसर में बड़े स्तर पर बसंत मेलों का आयोजन किया जाता रहा है. लोग 'बसंती' (पीली) पगड़ी पहनते हैं और पीले मीठे चावल (केसरिया भात) बनाकर आनंद लेते हैं.
शांतिनिकेतन का 'बसंत उत्सव': टैगोर की आधुनिक दृष्टि
रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन में 'बसंत उत्सव' को एक नया आयाम दिया. उन्होंने इसे केवल धार्मिक न रखकर एक सांस्कृतिक उत्सव बनाया जहाँ छात्र नाचते-गाते हुए प्रकृति का स्वागत करते हैं. इसमें 'रवींद्र संगीत' और 'पलाश' के फूलों का उपयोग इसे शेष भारत से अलग और अधिक सुरुचिपूर्ण बनाता है.
दक्षिण भारत: श्री पंचमी और विद्या देवी
आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में इसे 'श्री पंचमी' के रूप में मनाया जाता है यहाँ विशेष रूप से सरस्वती मंदिरों (जैसे बासर का सरस्वती मंदिर) में छोटे बच्चों का 'अक्षर ज्ञान' संस्कार करवाया जाता है. यहाँ की पूजा पद्धति में वैदिक मंत्रों का उच्चारण और शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति मुख्य होती है।
उत्सव की सही विधि
पीले रंग का दार्शनिक महत्व
इस पर्व में पीला रंग सर्वव्यापी है । इसके पीछे कई कारण हैं:
मनोवैज्ञानिक प्रभाव: पीला रंग प्रसन्नता, आशावाद और ऊर्जा का प्रतीक है, जो सीखने की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है
प्राकृतिक तालमेल: बसंत में सरसों के फूल और सूर्य की किरणें पीले रंग की प्रधानता दर्शाती हैं
आध्यात्मिक संबंध: पीला रंग गुरु (बृहस्पति) ग्रह से भी संबंधित है, जो ज्ञान और धर्म का कारक है
पूजा के मुख्य चरण
स्नान और शुद्धि: प्रातः काल हल्दी मिश्रित जल से स्नान कर पीले वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है.
प्रतिमा स्थापना: देवी सरस्वती की मूर्ति या चित्र को पीले कपड़े पर स्थापित कर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करनी चाहिए.
नैवेद्य और अर्पण: देवी को पीले फूल (गेंदा या सरसों), अक्षत, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं । विशेष रूप से पीले रंग की मिठाइयाँ जैसे बूंदी के लड्डू या केसरिया भात का भोग लगाया जाता है.
विद्या सामग्री की पूजा: अपनी कलम, डायरी, किताबें और वाद्य यंत्रों को देवी के चरणों में रखना चाहिए ।
त्याग और संयम
बसंत पंचमी के दिन कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है ताकि श्रद्धा बनी रहे:
पुस्तकों का अपमान: किताबों को पैरों से नहीं छूना चाहिए और न ही उन्हें इधर-उधर फेंकना चाहिए.
अशुद्धता: पूजा स्थल पर शोर-शराबा नहीं करना चाहिए और सात्विक आहार ग्रहण करना चाहिए.
बसंत पंचमी मनाने की सही विधि (पूजा विधि)
बसंत पंचमी की पूजा सरस्वती देवी को समर्पित होती है। यहां सरल विधि है:
सुबह उठकर स्नान: पीले वस्त्र पहनें और पूजा स्थल साफ करें।
पूजा सामग्री: सरस्वती की मूर्ति या चित्र, पीले फूल, पीला चंदन, किताबें, वाद्ययंत्र, फल, मिठाई।
संकल्प: "ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:" मंत्र से संकल्प लें।
ध्यान: सरस्वती ध्यान मंत्र - "ॐ सरस्वती मय दृष्ट्वा, वीणा पुस्तक धारिणीम्। हंसारूढ़ा महादेवी, विद्या दान कर प्रभो।"
आह्वान: "ॐ या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥ या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥" पढ़ें।
अर्घ्य और नैवेद्य: फल, मिठाई चढ़ाएं - "इदं फलं ॐ सरस्वत्यै नमः"।
आरती: सरस्वती आरती गाएं और दीपक जलाएं।
प्रसाद वितरण: पीले चावल या मिठाई बांटें।
विद्या आरंभ: बच्चों को पहला अक्षर लिखवाएं।
महत्वपूर्ण मंत्र
सरस्वती पूजा में इन मंत्रों का जाप फलदायी है:
बीज मंत्र: ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः।
ध्यान मंत्र: ॐ सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि। विद्या आरम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥
गायत्री मंत्र: ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमही। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
नील सरस्वती मंत्र: घोर रूपे महारावे सर्वशत्रु भयंकरि। भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणा गतम्॥
परीक्षा सफलता मंत्र: नमस्ते शारदे देवी, काश्मीरपुर वासिनी, सासारदा सासारदा सासारदा नमो नमः॥
ज्योतिषीय महत्व और 'अबूझ मुहूर्त'
बसंत पंचमी को ज्योतिष शास्त्र में 'स्वयं सिद्ध मुहूर्त' माना गया है.
शुभ कार्य: इस दिन विवाह, नामकरण, अन्नप्राशन और नए घर में प्रवेश जैसे कार्यों के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती.
बृहस्पति दोष निवारण: माना जाता है कि इस दिन सरस्वती पूजा करने से कुंडली में गुरु (बृहस्पति) से संबंधित दोष दूर होते हैं और व्यक्ति को निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त होती है.
रोचक तथ्य और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां
शबरी का प्रसंग: कुछ रामायण प्रसंगों के अनुसार, भगवान राम का शबरी से मिलन बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था.
40 दिनों का अंतर: बसंत पंचमी के ठीक 40 दिन बाद होली का त्यौहार आता है। यह अंतराल ऋतु परिवर्तन की एक पूरी चक्रावधि को दर्शाता है.
हंस और मयूर: देवी सरस्वती का वाहन 'हंस' विवेक का प्रतीक है (जो दूध और पानी को अलग कर देता है), जबकि 'मयूर' कलात्मक सौंदर्य और अहंकार पर विजय का प्रतीक है.
श्वेत कमल: यह कीचड़ में खिलकर भी अछूता रहने की क्षमता को दर्शाता है, जो एक सच्चे विद्वान का गुण होना चाहिए.
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