Bharat Singh Bharti Biography: Padmashree winner Bhojpuri folk singer

BhojpuriApp

भरत सिंह भारती: भोजपुर की मिट्टी से निकलकर पद्मश्री तक

एक ऐसी आवाज़ जिसने लालटेन की रोशनी से शुरू होकर दुनिया के बड़े से बड़े मंचों पर भोजपुरी संस्कृति का परचम लहराया...

बचपन: गाँव की गलियों में बिखरी संगीत की सौंधी खुशबू

20 नवंबर 1936 को बिहार के भोजपुर जिले के अगिआंव प्रखंड के नोनउर गाँव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे भरत सिंह भारती जी की कहानी उस समय शुरू हुई जब संगीत का कोई साधन नहीं था, सिर्फ़ संस्कार थे। उनके पिता स्वर्गीय सत्यनारायण सिंह खुद किसान थे लेकिन संगीत के शौक़ीन थे। दुर्भाग्य से भरत सिंह जी को मात्र छह महीने की उम्र में ही पिता की छतरछाया से हाथ धोना पड़ा।
लेकिन जो ख़ून में था, वो कहीं नहीं जा सकता था। महज 10 साल की उम्र में ही उन्होंने गाँव की कीर्तन मंडलियों में गाना शुरू कर दिया। आज की भाषा में कहें तो "गाँव का चर्च" जहाँ लोग रामायण महाभारत के पाठ गाते थे। वहीं से शुरू हुआ सफ़र आगे चलकर इतिहास बन गया।

संगीत की शिक्षा: गुरु-शिष्य परंपरा का जीवंत उदाहरण

15 साल की उम्र तक आते आते भरत सिंह जी को लगा कि अब विधिवत शिक्षा की ज़रूरत है। तब उन्होंने आरा (भोजपुर) के प्रसिद्ध पखावज और मृदंगाचार्य पंडित शत्रुंजय प्रसाद सिंह उर्फ़ ललन जी की शरण ली। यह वो दौर था जब गुरु शिष्य परंपरा ज़िंदा थी सुबह उठकर रियाज़, घंटों ताल सीखना, और गुरु की एक एक बात पर चलना।

इसके बाद उन्होंने सिर्फ़ गायन ही नहीं, बल्कि कई वाद्य यंत्रों में महारत हासिल की:

तबला (20 साल तक तबला बजाते हुए गायन की कला)
हारमोनियम
बाँसुरी
सितार
ढोलक
झाल (झांझ)
यही नहीं, पढ़ाई में भी वो पीछे नहीं रहे। मगध विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातक की डिग्री ली, लेकिन दिल था कि संगीत में ही लगता था। इसलिए नौकरी के तौर पर उन्होंने शिक्षक का पद ग्रहण किया और 1998 में सेवानिवृत्त हुए.

ऑल इंडिया रेडियो से शुरुआत: 1962 की ऐतिहासिक पहल

1962 में जब भरत सिंह जी आकाशवाणी पटना (ऑल इंडिया रेडियो) में शामिल हुए, तब भोजपुरी लोकगीत को राष्ट्रीय स्तर की पहचान मिलनी शुरू हुई। उन्हें 'ग्रेड टॉप' कलाकार का दर्जा मिला। यह वो ज़माना था जब रेडियो ही सबसे बड़ा माध्यम था।
इसके बाद उनके कदम लखनऊ, मद्रास (चेन्नई), दिल्ली और भुवनेश्वर के दूरदर्शन केंद्रों तक पहुँचे। उनकी आवाज़ और उनके बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र लोगों के दिलों पर राज करने लगे।

विलुप्तप्राय लोकगीतों को नई जान: सांस्कृतिक संरक्षण का जीवन

भरत सिंह भारती जी का सबसे बड़ा योगदान भोजपुरी की उन विलुप्तप्राय लोक विधाओं को बचाना है जो आधुनिकता की भागदौड़ में खोने लगी थीं:
पवरिया - नवजात शिशु के जन्म पर गाया जाने वाला पारंपरिक गीत
जतसार - एक विशेष लोक शैली
चौहट - विवाह आदि अवसरों पर गाया जाने वाला गीत
कीर्तनीय - कीर्तन शैली
डोमकच - विवाह के समय महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला गीत
विदेशिया - प्रवासी भोजपुरियों की व्यथा व्यक्त करने वाली शैली
लोरी - बच्चों को सुलाने वाली पारंपरिक लोरियाँ
1970 और 80 के दशक में जब साधन नहीं थे, तब ये लालटेन और ढिबरी की रोशनी में मंच पर गाते थे। साइकिल या बैलगाड़ी से गाँव गाँव जाकर लोकगीतों की प्रस्तुति देते थे। कई बार एक ही माइक्रोफोन में गाना होता था, लेकिन इनकी लगन कभी कम नहीं हुई।

अंतरराष्ट्रीय पहचान: मॉरीशस से ऑस्ट्रेलिया तक भोजपुरी धूम

भरत सिंह भारती ने सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भोजपुरी संस्कृति का परचम लहराया:
मॉरीशस: सागर महोत्सव में उनके एल्बम 'पुरबिया तान' का लोकार्पण तत्कालीन राष्ट्रपति अनरूध जगन्नाथ ने किया
फिजी, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया: इन देशों में भी उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों की प्रस्तुति दी
तमिलनाडु, गोवा, मध्य प्रदेश, दिल्ली: देश के कोने कोने में उन्होंने भोजपुरी संस्कृति का प्रचार किया

साहित्यिक योगदान: 'नायक बिधान' और अन्य रचनाएँ

सिर्फ़ गायक ही नहीं, भरत सिंह जी एक साहित्यकार भी हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'नायक बिधान' (1975) जो अब तक तीन संस्करणों में प्रकाशित हो चुकी है, भोजपुरी रंगमंच और लोकनाट्यों पर एक महत्वपूर्ण कृति है।
इसके अलावा दूरदर्शन के लिए निर्मित ऑडियो कैसेट और लोकगीत संग्रह आज भी ग्रामीण इलाकों में लोकप्रिय हैं। उन्होंने लगभग 5000 से अधिक गीतों को अपनी आवाज़ दी है और आठ भाषाओं (भोजपुरी, मगही, मैथिली, वज्जिका, हिंदी, तमिल, बंगला) पर अपनी पकड़ रखते हैं।

समाजसेवा और शिक्षा: 'गुरुजी' के नाम से प्रसिद्ध

बिहार में भरत सिंह भारती को सम्मानपूर्वक 'गुरुजी' कहा जाता है। इनका सामाजिक योगदान भी अद्वितीय है:

स्थापित संस्थाएँ:

तारा इंस्टीट्यूट ऑफ लर्निंग (1995, पटना के कंकड़बाग में)
भारती संगीत कला मंदिर (2005, नोनउर गाँव में)

निःशुल्क शिक्षा आंदोलन:

इन संस्थाओं के माध्यम से उन्होंने अब तक 10,000 से अधिक युवक युवतियों को निःशुल्क लोकसंगीत की शिक्षा दी है। खासकर ग्रामीण और गरीब परिवारों की बेटियों को उन्होंने मंच तक पहुँचाया जो समाजिक बंधनों के कारण पीछे रह जाती थीं।

पाठ्यक्रम में स्थान:

उनकी जीवनी को एनसीईआरटी की कक्षा 9 की हिंदी पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, जो उनके सामाजिक महत्व को दर्शाता है।

पारिवारिक जीवन: खुशियों और दुःख का मिश्रण

भरत सिंह भारती जी के परिवार में:
पत्नी: लक्षिया देवी (लगभग 20-25 साल पूर्व ब्लड कैंसर से निधन)
तीन पुत्र: सहजानंद सिंह, संजय कुमार शुभासी, राजीव कुमार भारती
दो पुत्रियाँ: बिमला देवी और यशोदा देवी
पत्नी का निधन इनके जीवन का सबसे बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने इस दुःख को भी संगीत में समाहित कर लिया और समाजसेवा में लगे रहे।

सम्मान और पुरस्कार: राष्ट्रीय मान्यता की कहानी

प्रमुख सम्मान:

पद्मश्री (2026) - भारत सरकार द्वारा लोकगायन के क्षेत्र में
संगीत नाटक अकादमी अमृत पुरस्कार (2022-23) - तत्कालीन उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा सम्मानित
विंध्यवासिनी देवी पुरस्कार (2015-16) - मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा
पूर्वी पुरोधा महेंद्र मिश्रा स्मृति सम्मान (2025)
भोजपुरी रत्न सम्मान
लोक राग सम्मान
भिखारी ठाकुर स्मृति सम्मान
बिहार कला पुरस्कार

महत्वपूर्ण भूमिकाएँ:

आकाशवाणी पटना के ऑडिशन बोर्ड के सदस्य (2015)
बिहार कला, संस्कृति और युवा विभाग में नीति निर्माण (2017)
युवा उत्सवों में निर्णायक (पूर्णिया 2017, सारण छपरा 2023)

वर्तमान स्थिति: 90 वर्ष की उम्र में भी सक्रिय

2026 में करीब 90 वर्ष की उम्र में भी भरत सिंह भारती जी पूरी तरह सक्रिय हैं। वे आज भी:
गाँव गाँव जाकर लोकसंस्कृति को जीवित रखने का काम कर रहे हैं
नई पीढ़ी के कलाकारों का मार्गदर्शन कर रहे हैं
विभिन्न कला समितियों में सदस्य के रूप में जुड़े हुए हैं

पद्मश्री सम्मान: जन भावनाओं की विजय

25 जनवरी 2026 को जब पद्मश्री सम्मान की घोषणा हुई, तो पूरा नोनउर गाँव और भोजपुर जिला खुशी से झूम उठा। इस मौके पर भरत सिंह भारती जी ने कहा:
"यह सम्मान मुझे काफ़ी पहले मिल जाना चाहिए था, लेकिन फिर भी बेहद खुशी हो रही है। हम तो संगीत विधा के आदमी हैं। जीवन भर संगीत की अलग-अलग विधाओं को आत्मसात किया, उन्हें प्रसारित किया। जब लोग हमारे गीतों से प्रसन्न होते हैं, वही हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।"

उत्तराधिकार: एक विरासत जो जारी रहेगी

भरत सिंह भारती का जीवन उन नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है जो कला के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं। उन्होंने साबित किया है कि:
* साधारण पृष्ठभूमि से आकर भी असाधारन उपलब्धियाँ मिल सकती हैं
* लोकगीत शास्त्रीय गरिमा से कोम कम नहीं होते
* सच्ची लगन से लोक परंपराओं को बचाया जा सकता है
* कला के माध्यम से समाज को मज़बूत किया जा सकता है
उनके द्वारा स्थापित नोनउर घराना आज भी लोकसंगीत की शिक्षा का प्रमुख केंद्र है और हज़ारों युवा इससे जुड़कर अपना और संस्कृति का भविष्य सँवार रहे हैं।

भरत सिंह भारती सिर्फ़ एक गायक नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता के संरक्षक, सांस्कृतिक धरोहर के पुजारी और हज़ारों विद्यार्थियों के गुरु हैं जिन्होंने लोकगीत को शास्त्रीय सम्मान दिलाकर इतिहास रच दिया है।

Bharat Singh Bharti Padma Shri 2026 | Biography, Achievements, Complete Information
Bharat Singh Bharti Padma Shri 2026 | Biography, Achievements, Complete Information

भरत सिंह भारती को पद्म श्री 2026 से सम्मानित किया गया। जानिए 78 वर्षीय भोजपुरी लोकगायक की जीवनी, उपल...


Written by - Sagar

Likes (0) comments ( 0 )
2026-01-27 14:29:58

Please login to add a comment.


No comments yet.