
Islamic Calendar, Hijri: History, Names of Months, Difference from Gregorian and Special Dates
हिजरी कैलेंडर: सिर्फ तारीखों का हिसाब नहीं, इबादत और इतिहास का सफर
क्या आपने कभी सोचा है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ त्योहार, जैसे कि रमज़ान, ईद या मुहर्रम, हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर के हिसाब से अलग-अलग तारीखों पर क्यों आते हैं? यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक गहरी, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रणाली का परिणाम है जिसे हिजरी कैलेंडर (Hijri Calendar) के नाम से जाना जाता है। जहाँ दुनिया का अधिकांश हिस्सा सौर चक्र पर आधारित ग्रेगोरियन कैलेंडर का पालन करता है, वहीं हिजरी कैलेंडर पूरी तरह से चंद्रमा की गति पर आधारित है, जो इसे अद्वितीय बनाता है।
कैसे हुई हिजरी कैलेंडर की शुरुआत? एक ऐतिहासिक मोड़
हिजरी कैलेंडर का इतिहास एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है जिसे ‘हिजरत’ (Hijrah) कहा जाता है। इसकी शुरुआत 622 ईस्वी में हुई थी, जब इस्लाम के पैगंबर हज़रत मुहम्मद (PBUH) और उनके अनुयायियों को मक्का में इस्लाम का प्रचार करने के कारण भारी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा था । शांति और सुरक्षा के लिए, उन्होंने अपने साथियों के साथ मक्का को छोड़कर लगभग 450 किलोमीटर दूर स्थित मदीना शहर की ओर पलायन किया। यह यात्रा इस्लामी इतिहास में एक निर्णायक मोड़ थी ।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि हिजरी कैलेंडर का निर्माण स्वयं पैगंबर मुहम्मद (PBUH) के जीवनकाल में नहीं हुआ था। इसका मानकीकरण उनके निधन के कई साल बाद, इस्लाम के दूसरे खलीफा, हज़रत उमर इब्न अल-खत्ताब ने 638 ई. में किया था । उस समय, इस्लामी साम्राज्य का तेजी से विस्तार हो रहा था, और सरकारी तथा प्रशासनिक कार्यों जैसे कि कर संग्रह, संधियों और धार्मिक दायित्वों के लिए एक सुसंगत और एकीकृत समय प्रणाली की सख्त आवश्यकता महसूस की गई। खलीफा उमर ने इस प्रणाली को स्थापित करने का निर्णय लिया। उन्होंने हिजरत की घटना को कैलेंडर के शुरुआती बिंदु के रूप में चुना, न कि पैगंबर के जन्म या किसी अन्य महत्वपूर्ण घटना को।
हिजरी से पहले: समय की गणना कैसे होती थी?
हिजरी कैलेंडर की स्थापना से पहले, अरब प्रायद्वीप में कोई एकीकृत कैलेंडर प्रणाली मौजूद नहीं थी । उस समय की व्यवस्था बिखरी हुई और स्थानीय परंपराओं पर आधारित थी। विभिन्न कबीले अपने रीति-रिवाजों और चंद्र चक्रों के अनुसार समय का हिसाब रखते थे। महत्वपूर्ण घटनाओं का उपयोग संदर्भ बिंदुओं के रूप में किया जाता था। उदाहरण के लिए, जिस साल मक्का पर हाथियों के साथ हमला हुआ था, उसे "हाथी का वर्ष" के रूप में जाना जाता था और इसका उपयोग उस समय के आसपास की घटनाओं को याद करने के लिए किया जाता था।
हिजरी बनाम ग्रेगोरियन: सूर्य और चंद्रमा का गणित
हिजरी और ग्रेगोरियन कैलेंडर दो पूरी तरह से अलग प्रणालियों पर आधारित हैं। जहाँ ग्रेगोरियन कैलेंडर पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर की परिक्रमा पर आधारित एक सौर कैलेंडर है, वहीं हिजरी कैलेंडर चंद्रमा के चरणों पर आधारित एक शुद्ध चंद्र कैलेंडर है । इन दो प्रणालियों के बीच कुछ मूलभूत अंतर निम्नलिखित हैं:
वर्ष की अवधि: ग्रेगोरियन कैलेंडर में एक वर्ष में लगभग 365.24 दिन होते हैं। इसके विपरीत, हिजरी कैलेंडर में एक वर्ष में आमतौर पर 354 या 355 दिन होते हैं ।
मासिक अवधि: ग्रेगोरियन कैलेंडर में महीनों की लंबाई निश्चित होती है (30 या 31 दिन, फरवरी को छोड़कर)। वहीं, हिजरी कैलेंडर में एक महीने की शुरुआत नए अर्धचंद्र (crescent moon) के दिखने पर निर्भर करती है, जिसके कारण महीने 29 या 30 दिन के होते हैं ।
वार्षिक अंतर: हिजरी वर्ष ग्रेगोरियन वर्ष से लगभग 10 से 12 दिन छोटा होता है ।
यह वार्षिक अंतर ही सबसे महत्वपूर्ण परिणाम देता है। चूंकि हिजरी कैलेंडर में सौर वर्ष के साथ तालमेल बिठाने के लिए कोई अतिरिक्त महीना नहीं जोड़ा जाता, इसके महीने धीरे-धीरे ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर मौसम से होकर गुजरते हैं। यह बताता है कि क्यों रमज़ान, ईद और अन्य इस्लामी त्योहार हर साल अलग-अलग तारीखों पर आते हैं और हर 33 साल में सभी मौसमों से होकर गुजरते हैं ।
हिजरी के साथी: अन्य चंद्र-सौर कैलेंडर
हिजरी कैलेंडर की विशिष्टता को समझने के लिए, इसकी तुलना अन्य प्रमुख कैलेंडरों से करना उपयोगी है जो चंद्र-आधारित तो हैं, लेकिन हिजरी की तरह "शुद्ध चंद्र" नहीं हैं। ये कैलेंडर अक्सर चंद्र-सौर प्रणाली पर आधारित होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति को ध्यान में रखते हैं ।
भारतीय कैलेंडर: विक्रम संवत और शक संवत जैसे भारतीय कैलेंडर चंद्र-सौर प्रणाली पर चलते हैं । इन कैलेंडरों में, चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच के अंतर को पाटते हुए, हर 2-3 साल में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है जिसे 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं । यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि त्योहार और ऋतुएँ एक ही समय पर पड़ें।
यहूदी और चीनी कैलेंडर: ये भी चंद्र-सौर प्रणाली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं । ये कैलेंडर भी 'लीप मंथ' (अतिरिक्त महीना) जोड़ते हैं ताकि उनके त्योहार, जो अक्सर कृषि या मौसम से संबंधित होते हैं, सही मौसम में पड़ें । चीनी कैलेंडर, विशेष रूप से, किसानों की जरूरतों के लिए डिज़ाइन किया गया था, जो उन्हें फसल और मौसम चक्र के बारे में जानकारी देता था ।
हिजरी के 12 महीने: नाम, अर्थ और उनकी कहानी
हिजरी कैलेंडर में भी 12 महीने होते हैं, जिनके नाम इस्लाम के आगमन से पहले से चले आ रहे हैं। ये नाम प्राचीन अरब के मौसम, समाज और रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं। ये महीने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व से भरे हैं।
1. मुहर्रम (Muharram): हिजरी साल का पहला महीना। इसका शाब्दिक अर्थ है "निषिद्ध" । इस्लाम-पूर्व अरब में, इस महीने में लड़ाई-झगड़ा करना वर्जित था। यह रमज़ान के बाद दूसरा सबसे पवित्र महीना माना जाता है ।
महत्वपूर्ण दिन: 10 मुहर्रम को 'आशूरा' का दिन कहते हैं । यह दिन पैगंबर मुहम्मद (PBUH) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में हुई शहादत को याद करने के लिए मातम और शोक का महीना माना जाता है । शिया मुस्लिम समुदाय में इस दिन ताज़िया निकाले जाते हैं और मजलिसों का आयोजन किया जाता है ।
2. सफर (Safar): दूसरा महीना। इसका अर्थ "खाली" है । कहा जाता है कि इस महीने में लोग अपने घरों को खाली छोड़कर लड़ाई या व्यापार के लिए जाते थे ।
3. रबीउल-अव्वल (Rabi' al-Awwal): तीसरा महीना, जिसका अर्थ है "पहली बसंत" ।
महत्वपूर्ण दिन: 12 रबीउल-अव्वल को 'मीलाद उन-नबी' या 'मीलाद ए नबी' के रूप में मनाया जाता है, जो पैगंबर मुहम्मद (PBUH) के जन्मदिन के रूप में चिह्नित है ।
4. रबीउल-आख़िर (Rabi' al-Akhir): चौथा महीना, जिसे 'रबी-उल-सानी' भी कहा जाता है । इसका अर्थ "आखिरी बसंत" है ।
5. जमादीउल-अव्वल (Jumada al-Awwal): पाँचवाँ महीना। इसका नाम 'जमना' से आया है । यह सर्दियों का महीना था जब पानी जम जाता था।
6. जमादीउल-आख़िर (Jumada al-Akhir): छठा महीना, जिसे 'जुमादा-उल-सानी' भी कहते हैं । इसका अर्थ "आखिरी जमने का समय" है।
7. रजब (Rajab): सातवां महीना। इसका नाम अरबी शब्द 'रजब' से लिया गया है, जिसका अर्थ है "सम्मान" । यह भी चार पवित्र महीनों में से एक था जिसमें युद्ध करना वर्जित था ।
महत्वपूर्ण दिन: 27 रजब को 'शब-ए-मेराज' के रूप में मनाया जाता है, जो पैगंबर मुहम्मद (PBUH) की जन्नत की रहस्यमय यात्रा को याद करता है ।
8. शाबान (Sha'ban): आठवां महीना, जिसका अर्थ है "फैलना" । कहा जाता है कि इस महीने में लोग पानी की तलाश में फैल जाते थे ।
महत्वपूर्ण दिन: 15 शाबान को 'शब-ए-बारात' की रात मनाई जाती है ।
9. रमज़ान (Ramadan): नौवां महीना, जिसे सबसे पवित्र माना जाता है। इसका नाम 'अर-रम्दा' से लिया गया है, जिसका अर्थ है "अत्यधिक गर्मी" या "जलना" । यह महीना दिन के समय रोज़े रखने के लिए जाना जाता है ।
महत्वपूर्ण दिन: रमज़ान को तीन 'अशरों' (10-10 दिन के हिस्सों) में बांटा गया है, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशेष महत्व है । आखिरी 10 दिनों में से एक रात, जिसे 'लैलतुल-क़द्र' या 'शब-ए-क़द्र' कहा जाता है, को वर्ष की सबसे पवित्र रात माना जाता है ।
10. शव्वाल (Shawwal): दसवां महीना। इसका अर्थ है "उठाना" या "दूर ले जाना" ।
महत्वपूर्ण दिन: 1 शव्वाल को 'ईद उल-फ़ित्र' मनाई जाती है, जो रमज़ान के रोज़े पूरे होने का जश्न है ।
11. ज़िल-क़ाद (Dhul al-Qadah): ग्यारहवां महीना। इसका अर्थ है "शांति का मालिक" या "बैठना" । यह भी एक पवित्र महीना था जिसमें युद्ध करना वर्जित था ।
12. ज़िल-हिज्ज (Dhul al-Hijjah): बारहवां और आखिरी महीना। इसका अर्थ है "तीर्थयात्रा का महीना" ।
महत्वपूर्ण दिन: इस महीने में हज की वार्षिक तीर्थयात्रा की जाती है, जो इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है । 10 ज़िल-हिज्ज को 'ईद उल-अज़हा' (बकरीद) मनाई जाती है, जो हज के समापन को भी चिह्नित करती है ।
इस्लामी कालदर्शक की कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ हैं:
1 मुहरम (इस्लामी नया वर्ष)
10 मुहरम (आशूरा) मूसा बनी इस्राईल को लेकर फ़िरौन से छुटकारा पाकर "रेड सी" पार करते हैं। और भी; हुसैन इब्न अली और उन के साथी कर्बला के युद्ध में शहीद होते हैं।
12 रबीउल अव्वल -- मीलाद ए नबी
17 रबीउल अव्वल -- शिया समूह "इस्ना अशरी" इस दिन ईद ए मीलाद मनाते हैं।
13 रजब -- अली इब्ने अबी तालिब का जन्म दिन
27 रजब -- इस्रा और मेराज (शब-ए-मेराज)
22 रजब -- मुस्लिम के थोडे समूहों मे "कुंडों की नियाज़", "सफ़्रे के फ़ातिहा" के नाम पर मन्नतें और उन्के पूरे होने पर फ़ातिहा ख्वानी करते हैं। और यह फ़ातिहा ख्वानी हज़रत इमाम जाफ़र-ए-सादिक़ के नाम से जुडी है।
1 रमज़ान -- उपवास रखने की शुरूआत का पहला दिवस
21 रमज़ान -- अली इब्न अबी तालिब के देहांत का दिन।
27 रमज़ान -- क़ुर'आन के अवतरण का दिन। और शब-ए-क़द्र या लैलतुल क़द्र
1 शव्वाल -- ईद उल फ़ितर या ईद उल-फ़ित्र या ईद उल-फ़ित्र या ईदुल फ़ितर या ईदुल फ़ित्र
8-10 ज़ुल-हज्जा -- मक्का तीर्थ यात्रा या हज
10 ज़ुल हज्जा -- ईद-उल-अज़हा या ईद उल-अधा या ईदुल अधा या बक़र ईद या बक्रीद
चाँद का दीदार: तारीखों के निर्धारण का रहस्य
हिजरी कैलेंडर का हर नया महीना चाँद के नए वर्धमान (crescent) रूप को देखकर शुरू होता है । यह एक परंपरा है जो पैगंबर मुहम्मद (PBUH) की सीधी हिदायत पर आधारित है । इस प्रणाली के तहत, त्योहारों की तारीखें खगोलीय गणनाओं के बजाय प्रत्यक्ष अवलोकन पर निर्भर करती हैं। इस वजह से, अलग-अलग देशों और कभी-कभी एक ही देश के अलग-अलग हिस्सों में भी चाँद दिखने के समय के आधार पर त्योहारों की तारीखों में अंतर हो सकता है, जिसके कारण कभी-कभी "दो ईदें" भी हो जाती हैं ।
यह परंपरा एक सामुदायिक अनुभव का हिस्सा है, लेकिन आधुनिक युग में इसने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है: क्या हमें चाँद के भौतिक दर्शन पर निर्भर रहना चाहिए या खगोलीय गणनाओं का उपयोग करना चाहिए?
परंपरा का पक्ष: कुछ विद्वानों का मानना है कि पैगंबर की हिदायत का पालन करना अनिवार्य है। उनके अनुसार, चाँद को देखना खुद एक इबादत है, और गणना इसका विकल्प नहीं हो सकती । यह दृष्टिकोण समुदाय को उसकी ऐतिहासिक जड़ों और आध्यात्मिक प्रथाओं से जोड़ता है।
गणना का पक्ष: दूसरी ओर, कुछ विद्वानों का तर्क है कि पैगंबर ने गणना से बचने की सलाह उस समय की अक्षमता के कारण दी थी । आज, खगोल विज्ञान इतना सटीक है कि यह पहले से ही नई चाँद की स्थिति बता सकता है, जिससे त्योहारों की तारीखों को लेकर वैश्विक एकता लाई जा सकती है । इस दृष्टिकोण के समर्थक मानते हैं कि आधुनिक विज्ञान का उपयोग करके त्योहारों को एक ही दिन मनाना, मुस्लिम समुदाय के बीच एकता को बढ़ावा देगा।
सप्ताह के दिवस
इस्लामी सप्ताह, यहूदी सप्ताह के समान ही होता है, जो कि मध्य युगीय ईसाई सप्ताह समान होता है। इसका प्रथम दिवस भी रविवार के दिन ही होता है। इस्लामी एवं यहूदी दिवस सूर्यास्त के समय आरंभ होते हैं, जबकि ईसाई एवं ग्रहीय दिवस अर्धरात्रि में आरम्भ होते हैं।[3] मुस्लिम साप्ताहिक नमाज़ हेतु मस्जिदों में छठे दिवस की दोपहर को एकत्रित होते हैं, जो कि ईसाई एवं ग्रहीय शुक्रवास को होता है। ("यौम जो संस्कृत मूल "याम" से निकला है,يوم" अर्थात दिवस)
अरबी नाम हिन्दी नाम उर्दू नाम फारसी नाम
यौम अल-अहद يوم الأحد रविवार इतवार اتوار एक-शनबेह
यौम अल-इथनायन يوم الإثنين सोमवार पीर پير दो-शनबेह
यौम अथ-थुलाथा' يوم الثُّلَاثاء मंगलवार मंगल منگل सेह-शनबेह
यौम अल-अरबिया يوم الأَرْبِعاء बुद्धवार बुद्ध بدھ चाहर-शनबेह
यौम अल-खमीस يوم الخَمِيس बृहस्पतिवार जुम्महरत جمعرات पन्ज-शनबेह
यौम अल-जुमुआ`a يوم الجُمُعَة शुक्रवार जुम्मा جمعہ जोमएह, या अदिनेह
यौम अस-सब्त يوم السَّبْت शनिवार हफ्ता ہفتہ शनबेह
उपसंहार: एक कैलेंडर जो आस्था की पहचान है
हिजरी कैलेंडर सिर्फ एक समयरेखा नहीं है। यह एक गतिशील प्रणाली है जो ऐतिहासिक पलायन की स्मृति से जुड़ी है, भक्ति को मौसमों से परे ले जाती है, और दुनिया भर के मुसलमानों को एक साझा, आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ती है। यह एक ऐसा कैलेंडर है जो इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ से शुरू होता है और हर साल 10 से 12 दिन पीछे खिसक कर हर मौसम को गले लगाता है, यह साबित करता है कि आस्था और समर्पण किसी भी मौसम या परिस्थिति से परे होते हैं।
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